Saturday, July 1, 2017

अंतरराष्ट्रीय हिंदी ब्लॉग दिवस - टिप्पण्यानन्द जी लिखेंगे पावस पर पोस्ट!

“नमस्कार लिख्खाड़ानन्द जी!”

“नमस्काऽऽर! आइये आइये टिप्पण्यानन्द जी!”

“सुना है लिख्खाड़ानन्द जी, १ जुलाई, याने कि आज अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी ब्लॉग दिवस मनाया जा रहा है।”

“जी हाँ टिप्पण्यानन्द जी, ताऊ रामपुरिया जी/ ने इसका आगाज किया है, और खुशदीप सहगल जी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी ब्लॉग दिवस के लिए टैग का चुनाव करने हेतु खून पसीना एक कर रहे हैं।”

“तो अब तो हिन्दी ब्लॉगरों की बल्ले बल्ले हो गई”

“होगी क्यों नहीं भइ! आप टिपियाने वालों को भी तो टिपयाने बहुत चांस मिलेता। तो टिप्पण्यानन्द जी, हिन्दी ब्लॉग दिवस के इस शुभ अवसर पर आप क्या करेंगे? मेरा तो सुझाव है कि आप अब टिपियाने के साथ जोरदार पोस्ट लिखना भी शुरू कर दें। कहिये कैसा रहेगा?”

“सुझाव तो आपका बहुत बढ़िया है लिख्खाड़ानन्द जी! पर हम लिखें क्या? हमें तो कुछ सूझता ही नहीं। क्या लिखें और किस पर लिखें?”

“अरे बरसात का मौसम शुरू हो है टिप्पण्यानन्द जी। आप वर्षा ऋतु पर ही पोस्ट लिख डालिए।”

“चलिए, मैं सुझाता हूँ आपको। पर पोस्ट आपको ही लिखना होगा।”

“ऐसा है, मैं जरूर लिखूँगा जी।”

“तो अपने पोस्ट में पहले आप यह बताएँ कि हमारा देश भारत ही विश्व में ऐसा देश है जहाँ तीन ऋतुएँ (ग्रीष्म ऋतु, वर्षा ऋतु और शीत ऋतु) होती हैं, अन्य देशों में केवल ग्रीष्म ऋतु और शीत ऋतु होती है, वर्षा ऋतु नहीं होती। उन देशों में वर्षा या तो ग्रीष्म ऋतु के दौरान होती है या फिर शीत ऋतु के दौरान। इसक मतलब यह हुआ कि वर्षा ऋतु का आनन्द हम भारतवासी है ले सकते हैं, विश्व के अन्य देशों के लोग इसका आनन्द नहीं उठा सकते।”

“वाह! वाह!! लिख्खाड़ानन्द जी। यह तो हमें पता ही नहीं था कि वर्षा ऋतु सिर्फ भारत में होती है।”

“अब तो पता चल गया ना! तो फिर अपने पोस्ट के माध्यम से यह जानकारी और लोगों को भी दीजिए।

ग्रीष्म ऋतु के अंतिम दिनों में लोग जब भगवान भास्कर के प्रकोप से त्राहि-त्राहि करने लगते हैं तो वे सिर्फ यही चाहते हैं कि जल्दी से जल्दी बारिश हो जाये और इस भीषण गर्मी से निजात मिले।”

“हाँ यह तो होता है।”

“किसान की आँखें आसमान को तकती रहती हैं कि कब बादल बरसे और कब वह अपनी खेती बाड़ी का काम शुरू करे।”

“जी हाँ, बरसात के बिना तो खेती हो ही नहीं सकती”

“अच्छा बताइये कि वर्षा ऋतु को हिन्दी में और क्या कहते हैं?”

“शायद पावस कहते हैँ।”

“शायद नहीं, पावस ही कहा जाता है वर्षा ऋतु को। आदिकवि वाल्मीकि से लेकर आज के आधुनिक कवि, सभी पावस के दीवाने रहे हैं। रामायण महाकाव्य में महर्षि वाल्मीकि ने राम के मुख से कहलाया है -

क्वचिद् वाष्पाभिसंरुद्धान वर्षागमसमुत्सुकान्।
कुटजान् पश्य सौमित्रे पुष्पितान् गिरिसानुषु।
माम शोकाभिभतस्य कासंदीपनान् स्थितान्॥
(सामायण - 4-28-14)

अर्थ - हे सौमित्र, देखो! इस पर्वत के शिखरों पर खिले हुए कुटज कैसी शोभा पाते हैं। कहीं पहली बार वर्षा होने पर भूमि से निकले हुए भाप व्याप्त हो रहे हैं, तो कहीं वर्षा के आगमन से अत्यंत उत्सुक दिखाई देते हैं। मैं तो प्रिया-विरह के शोक से पीड़ित हूँ और ये कुटज मेरी प्रेमाग्नि को उद्दीप्त कर रहे हैं।

वर्षा ऋतु के विषय में राम यह भी कहते हैं - 'हे लक्ष्मण! देखो इस वर्षा ऋतु में प्रकृति कितनी सुन्दर प्रतीत होती है। ये दीर्घाकार मेघ पर्वतों का रूप धारण किये आकाश में दौड़ रहे हैं। इस वर्षा ऋतु में ये मेघ अमृत की वर्षा करेंगे। उस अमृत से भूतलवासियों का कल्याण करने वाली नाना प्रकार की औषधियाँ, वनस्पति, अन्न आदि उत्पन्न होंगे। इधर इन बादलों को देखो, एक के ऊपर एक खड़े हुये ये ऐसे प्रतीत होते हैं मानो प्रकृति ने सूर्य तक पहुँचने के लिये इन कृष्ण-श्वेत सीढ़ियों का निर्माण किया है। शीतल, मंद, सुगन्धित समीर हृदय को किस प्रकार प्रफुल्लित करने का प्रयत्न कर रही हैं, किन्तु विरहीजनों के लिये यह अत्यधिक दुःखदायी भी है। उधर पर्वत पर से जो जलधारा बह रही है, उसे देख कर मुझे ऐसा आभास होता है कि सीता भी मेरे वियोग में इसी प्रकार अश्रुधारा बहा रही होगी। इन पर्वतों को देखो, इन्हें देखकर लगता है जैसे ब्रह्मचारी बैठे हों। ये काले-काले बादल इनकी मृगछालाएँ हों। नद-नाले इनके यज्ञोपववीत हों और बादलों की गम्भीर गर्जना वेदमंत्रों का पाठ हो। कभी कभी ऐसा प्रतीत होता है कि ये बादल गरज नहीं रहे हैं अपितु बिजली के कोड़ों से प्रताड़ित हो कर पीड़ा से कराहते हुये आर्तनाद कर रहे हैं। काले बादलों में चमकती हुई बिजली ऐसी प्रतीत हो रही है मानो राक्षसराज रावण की गोद में मूर्छित पड़ी जानकी हो। हे लक्ष्मण! जब भी मैं वर्षा के दृश्यों को देख कर अपने मन को बहलाने की चेष्टा करता हूँ तभी मुझे सीता का स्मरण हो आता है। यह देखो, काले मेघों ने दसों दिशाओं को अपनी काली चादर से इस प्रकार आवृत कर लिया है जैसे मेरे हृदय की समस्त भावनाओं को जानकी के वियोग ने आच्छादित कर लिया है।

“इस वर्षा ऋतु में राजा लोग अपने शत्रु पर आक्रमण नहीं करते, गृहस्थ लोग घर से परदेस नहीं जाते। घर उनके लिये अत्यन्त प्रिय हो जाता है। राजहंस भीमानसरोवर की ओर चल पड़ते हैं। चकवे अपनी प्रिय चकवियों के साथ मिलने को आतुर हो जाते हैं और उनसे मिल कर अपूर्व प्राप्त करते हैं। किन्तु मैं एक ऐसा अभागा हूँ जिसकी चकवी रूपी सीता अपने चकवे से दूर है। मोर अपनी प्रियाओं के साथ नृत्य कर रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि बगुलों की पंक्तियों से शोभायमान, जल से भरे, श्यामवर्ण मेघ मानो किसी लम्बी यात्रा पर जा रहे हैं। वे पर्वतों के शिखरों पर विश्राम करते हुये चल रहे हैं। पृथ्वी पर नई-नई घास उग आई है और उस पर बिखरी हुई लाल-लाल बीरबहूटियाँ ऐसी प्रतीत होती हैं मानो कोई नवयौवना कामिनी हरे परिधान पर लाल बूटे वाली बेल लगाये लेटी हो। सारी पृथ्वी इस वर्षा के कारण हरीतिमामय हो रही हैं। सरिताएँ कलकल नाद करती हुईं बह रही हैं। वानर वृक्षों पर अठखेलियाँ कर रहे हैं। इस सुखद वातावरण में केवल विरहीजन अपनी प्रियाओं के वियोग में तड़प रहे हैं। उन्हें इस वर्षा की सुखद फुहार में भी शान्ति नहीं मिलती। देखो, ये पक्षी कैसे प्रसन्न होकर वर्षा की मंद-मंद फुहारों में स्नान कर रहे हैं। उधर वह पक्षी पत्तों में अटकी हुई वर्षा की बूँद को चाट रहा है। सूखी मिट्टी में सोये हुये मेंढक मेघों की गर्जना से जाग कर ऊपर आ गये हैं और टर्र-टर्र की गर्जना करते हुये बादलों की गर्जना से स्पर्द्धा करने लगे हैं। जल की वेगवती धाराओं से निर्मल पर्वत-शिखरों से पृथ्वी की ओर दौड़ती हुई सरिताओं की पंक्तियाँ इस प्रकार बिखर कर बह रही हैं जैसे किसी के धवल कण्ठ से मोतियों की माला टूट कर बिखर रही हो। लो, अब पक्षी घोंसलों में छिपने लगे हैं, कमल सकुचाने लगे हैं और मालती खिलने लगी है, इससे प्रतीत होता है कि अब शीघ्र ही पृथ्वी पर सन्ध्या की लालिमा बिखर जायेगी।'

गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी रामचरितमानस में श्री राम के मुख से कहलाया है -

घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा॥

ऋतु वर्णन में पारंगत 'सेनापति' ने वर्षा ऋतु का वर्णन इस प्रकार से किया है -

दामिनी दमक, सुरचाप की चमक, स्याम
घटा की घमक अति घोर घनघोर तै।
कोकिला, कलापी कल कूजत हैं जित-तित
सीतल है हीतल, समीर झकझोर तै॥
सेनापति आवन कह्यों हैं मनभावन, सु
लाग्यो तरसावन विरह-जुर जोर तै।
आयो सखि सावन, मदन सरसावन
लग्यो है बरसावन सलिल चहुँ ओर तै॥”

“लिख्खाड़ानन्द जी! हमारे फिल्मी गीतकारों ने भी तो वर्षा ऋृतु और सावन पर अनेक सुन्दर गीत लिखे हैं, जैसे -

बरसात में हम से मिले तुम सजन तुम से मिले हम...

छाई बरखा बहार पड़े अँगना फुहार सैंया आ के गले लग जा...

गरजन बरसत सावन आयो रे...

पड़ गए झूले सावन रुत आई रे...

ओ सजना बरखा बहार आई रस की फुहार लाई...

रिमझिम के तराने ले के आई बरसात...

काली घटा छाए मेरा जिया तरसाये...

ज़िंदगी भर नहीं भूलेगी बरसात की रात...

सावन का महीना पवन करे शोर...

मेघा छाये आधी रात बैरन बन गई निंदिया...

रिमझिम गिरे सावन...

काली घटाओं ने ठंडी हवाओं ने साजन को नटखट बना दिया...

बादल यूँ बरसता है डर कुछ ऐसा लगता है...”

“देखा! अब आपको भी सूझने लगा ना! तो फिर देर क्या है? जल्दी से लिख डालिये पावस पर पोस्ट”

“अच्छा, आपका हुकम सर आँखों पर, जा रहा हूं पोस्ट लिखने।”

“अरे चाय तो पीकर जाइये।”

“जी नहीं, मुझे पोस्ट लिखने की जल्दी है। नमस्कार!”

“नमस्कार”

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